आज ही सुबह फेसबुक पर मेरे भांजे संदीप ने कुछ पंक्तियाँ पोस्ट की जो कुछ इस प्रकार हैं :-
हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....
अच्छी पंक्तियाँ हैं मगर कुछ अधूरी सी लगीं साथ ही नकारात्मक भी क्योंकि फासलों की बात करती हैं, इसलिए उसके आगे की चंद पंक्तियाँ पूरी करने की कोशिश है जो मंजिल की बात करती हैं |
हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....
था यकीं कि राहें चलती हैं चलने वालों से,
मिलेंगे राह में मुसाफिर कई,
कोई तो होगा जो हमसफ़र होगा,
फासले कितने भी हों कम होंगे

Kya Baat Kya Baat Kya Baat.....
ReplyDelete