वैलेंटाइन डे
क्या प्रेम का इज़हार करने के लिए किसी ख़ास दिन या मौके की जरूरत होनी चाहिए ???
और अगर उस दिन चूक गए तो क्या प्रेम से भी चूक जायेंगे ???
नहीं ना ?
तो फिर इस दिन की अहमियत क्या है? क्यों इसे इतना अहम् बना दिया गया है ?
दिव्य भास्कर के १३ फ़रवरी के रविवारीय संस्करण में “r` ma> qILyu gulab” (रेगिस्तान में खिला गुलाब) में डा. शरद ठाकर का लिखा एक लेख पढ़ा जिसका शीर्षक था we>3 me> to mat/ taro p/em jo{Ae
मजदूर, जिसका नाम रूमाल है, को अपनी पत्नी "रेशम" का ख्याल आता है वो भी अपने प्रेम को इज़हार करने को उतावला हो जाता है अपने इस इज़हार को मूर्त रूप देने के लिए एक गिफ्ट खरीदने के लिए एक मौल पहुँच जाता है | अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई के जमा किये २०० रुपयों से एक रेशमी दुपट्टा खरीद कर दौड़ता हुआ अपनी पत्नी के पास पहुँच जाता है और उसे देता है | पत्नी पूछती है की ये क्या ले आया ? वो कहता है ये "वैलेंटाइन गिफ्फ़" है | वो क्या होता है रेशम पूछती है ? तू अनपढ़ है, तुझे कुछ पता नहीं है आज बड़े लोगो का त्यौहार है और उसमें ऐसा "गिफ्फ़" देने का रिवाज़ है |
रेशम दुपट्टे को देखकर कहती है कि इस रेशमी दुपट्टे का मैं क्या करुँगी, मजदूरी करने से हुई अपनी मटमैली काया को दिखाते हुए कहती है कि टाट पर मखमल का पैबंद जैसा है ये रेशमी दुपट्टा |
मजदूर, जिसका नाम " रूमाल" है, को लगता है कि उसकी गाढ़ी कमाई के पैसे धूल में मिल गए और वो उदास सा एक तरफ जा कर बैठ जाता है और रेशम शाम का भोजन खिचड़ी बनाने लग जाती है |
अचानक रूमाल को रेशम की चीख सुनाई देती है " रूमाल, संभालना", रूमाल ऊपर देखता है तो पाता है कि चौथी मंजिल पर काम कर रहे एक मजदूर के हाथो से औज़ारो से भरी तगारी गिर रही है और उस में रखे फावड़े कुदाल तेजी से उसी की ओर आ रहे हैं, रूमाल जान बचने के लिए दौड़ता है परन्तु फिर भी उस के पांव में फावड़े से गहरी चोट लग जाती है और उस में से खून की धारा बहने लगती है |
रेशम खून को देखकर घबरा जाती है और उसे रोकने के लिए तुरंत ही अपनी ओढनी को फाड़ कर जख्म पर बांधने को तत्पर होती है परन्तु उसे लगता है कि उसकी ओढनी तो बहुत गन्दी है, साफ़ कपड़े के लिए नज़र इधर उधर दौड़ाती है तो उसकी नज़र प्लास्टिक की थैली में बंधे रेशमी दुपट्टे पर पढ़ती है और वो तुरंत ही उस दुपट्टे को रूमाल के घाव पर बांध देती है |
रूमाल दोनों "रेशम" को देख रहा था, एक उसकी पत्नी और दूसरा जो उसके पाँव में बंधा था, रूमाल ने रेशम से कहा पगली दो सौ रूपये के दुपट्टे को ऐसे कोई फाड़ता है क्या ?
रेशम की आँखों में आंसू थे- वो कहती है की ये दुपट्टा मेरे किस काम आता, तू मेरे लिए लाया था और मैंने तेरे लिए इसे काम में ले लिया, कहीं इसे ही तो वो तुम्हारा "वैलेंटाइन गिफ्फ़" नहीं कहते | दोनों गरीब पति पत्नी खुले आसमान के नीचे मिलियन डॉलर जितने महंगे सानिध्य का आनंद ले रहे थे |
ठीक उसी समय उस बिल्डर की पत्नी उस से झगडा कर रही थी - बस आज के दिन भी मेरे लिए सिर्फ आठ हज़ार की ड्रेस लाये हो, अगर तुम मुझे सच्चा प्यार करते तो कम से कम हीरे का हार तो लाते, हे भगवान् , इस जंगली पुरुष ने तो मेरा वैलेंटाइन डे ही बर्बाद कर दिया |
लेखक ने अपनी कहानी यहीं ख़त्म कर दी परन्तु ये कहानी पढ़ कर मेरे मन में इसके आगे के प्रश्न उठने लगे - क्या दोनों किस्सों में प्रेम था? क्या दोनों पतियों को अपनी पत्नी से प्रेम नहीं था ? क्या दोनों का वैलेंटाइन डे पूरा हुआ ?
मेरे विचार में दोनों को ही अपनी अपनी पत्नी से प्रेम था मगर दोनों का गिफ्ट देने का आशय अलग अलग था - बिल्डर अपनी पत्नी को खुश करने के लिए गिफ्ट लाया था, उसे लगता था पत्नी की खुशी से उसे भी खुशी मिलेगी परन्तु पत्नी की खुशी और उस के गिफ्ट दोनों के बीच फासला रह गया | न पत्नी खुश हुई न उसे ही खुशी मिली |
रूमाल अपनी पत्नी तक उस गिफ्ट के द्वारा अपने प्रेम को पहुँचाना चाहता था इसलिए उस गिफ्ट के द्वारा उसकी पत्नी तक उसका प्रेम पहुँच सका |
प्रेम - जिसमें बिना कहे भी सब कुछ कहा जाता है और बिना सुने भी सब कुछ समझा जाता है | और इस कहने सुनने के लिए किसी "डे" की ज़रुरत नहीं होती |
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