Friday, February 4, 2011

लेह

लेह तुम मुझे बहुत याद आते हो,
सिन्धु के किनारे बैठ कर गुजारे हुए पल,
वो आसमान तक सर उठाये हुए पोपलर, 
वो बादल के कुछ टुकड़े, मानो खेल रहे हों लुका छिपी,
दूर तक फ़ैला आसमान,
नीलाभ का अर्थ होता है सार्थक जहाँ,

बदला क्यूँ रंग कुदरत ने,
थी मेहरबान फिर रूठी क्यों अचानक से,
पानी जो जीवन है बदल कर रूप बरसा था,
जो देता था जीवन लिए थे प्राण उसने ही,
एक ही पल में भूद्रशय था बदला,  
जहाँ सुन्दरता थी कभी फैली,
भयावह था अब वो मंज़र |

खुदाया तेरी रहमत हो, दुआ ये मांगते हैं हम,
बना दे स्वर्ग ये धरती, लौटा मुस्कान चेहरों पर |   



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