Friday, July 22, 2011

तो जिंदा हो तुम

दिलों में तुम अपनी 
बेताबियाँ  लेकर चल रहे हो 
तो जिंदा हो तुम 
नज़र में ख्वाबों की 
बिजलियाँ लेकर चल रहे हो 
तो जिंदा हो तुम
हवा के झोकों के जैसे 
आज़ाद रहना सीखो 
तुम एक दरिया के जैसे
लहरों में बहना सीखो
हर एक लम्हे से तुम मिलो 
खोले अपनी बाहें 
हर एक पल एक नया समां
देखें ये निगाहें 
जो अपनी आँखों में
हैरानियाँ लेकर चल रहे हो 
तो जिंदा हो तुम
दिलों में अपनी 
बेताबियाँ  लेकर चल रहे हो 
तो जिंदा हो तुम

Friday, June 3, 2011

खलिश

 वो ग़म ही क्या जो कम हो जाये,
खलिश न रहे सुकून हो जाये |
कुछ तो हो जो साथ न छोड़े मेरा,
तू न सही तेरा ग़म ही मेरा हो जाये ||

Thursday, March 24, 2011

नारी

नारी तुम हो प्रतिरूप,
उस महामहिम का,
जो रहता है हम सब के बीच, 
परन्तु दिखाई नहीं देता, 
कठिन काम वो तुम से ही कराता है,
किसी को दुलार तो कहीं संवेदना पहुंचाता है,
किसी को शक्ति देता है तो कहीं हिम्मत बंधाता है, 
प्रेम करना भी तो वो तुम्हे ही सिखाता  है,
चट्टान सा अडिग, आसमान सा असीम,
वो तुम्हे ही बनाता है, 
तुम ही हो उसका मूर्त रूप,
पल पल याद दिलाता है |

Friday, March 11, 2011

ख़ुशी देने के मौके


बात उन दिनों की है जब मैं अहमदाबाद-३ के लेखा परीक्षा विभाग में  कार्यरत था और ऋषि सर हमारे आयुक्त  थे । ऋषि सर के कार्यकाल के दौरान किसी भी अधिकारी को  उस  अनजाने डर का  डर नहीं होता था जो अन्य उच्च अधिकारियों के सामने जाने के दौरान होता था ।
ऋषि सर अपने विस्तृत अनुभवों के द्वारा हमारे दिमाग की अधखुली खिडकियों को खोल रहे थे ।  इसी कड़ी में एक कार्यक्रम था "ऑफिसर्स मीट" जिसमे कुछ अधिकारियों को आमंत्रित किया जाता था जो अपने अनुभवों को उपस्थित साथी अधिकारियों के साथ शेयर करते थे । इस सभा में वक्ता अपने कार्य से सम्बंधित या फिर अपने दैनिक जीवन में घटी किसी घटना के बारे में बता सकते थे, अर्थात विषय पर कोई पाबन्दी नहीं थी और इसी कारण ये सभा अनौपचारिक माहौल में होती थी तथा मेरे जैसे उन लोगो ले लिए एक सुन्दर माध्यम बन गयी थी जो मंच पर वक्तव्य देने में असुविधा महसूस करते थे ।  ऐसी ही एक सभा का अनुभव यहाँ शेयर करना चाहता हूं ….
उस दिन की सभा में भी कई अधिकारी आमंत्रित थे जिन्होंने अपने अपने चुने हुए विषय पर कुछ  न कुछ बोला|  कुछ ने अपने कार्य से सम्बंधित तो कुछ ने अपने निजी संस्मरण सुनाये | सभी ने अपने विचार अपने नजरिये को अपनी समझ के हिसाब से कहा जिसे सभी उपस्थित लोगों ने सुना और प्रत्येक ने अपने विचार, अपने नजरिये से उन बातों को समझा | जिस वक्तव्य से मैं प्रभावित हुआ अब उस वक्तव्य की बात करते हैं ।

मेरे एक सहकर्मी ने, जिनका नाम नहीं बताना चाहूँगा, सिर्फ "के"  कहूँगा, अपने जीवन के संस्मरण सुनाये |
आगे बढ़ने से पहले "के" के बारे में बता दूँ  - "के"  अपने विभाग को अच्छा खासा समय देने के बाद रिटायरमेंट के कगार पर थे,  वो सौराष्ट्र के रहने वाले एक सीधे साधे इंसान हैं जो अपने ठेठ देहाती लहजे में हिंदी को गुजराती संसकरण में बोलते हैं | दिल खोलके और सीधे दिल से, बिना किसी लाग लपेट के बोलते हैं उनके बोलने का अंदाज काफी मजाकिया लगता है परन्तु उनकी बातों में जीवन की सच्चाई होती है |

"के" ने कई बातें बोली जो उनके उन उच्च अधिकारीयों के बारे में थी जिन्होंने "के"  के मन को प्रभावित किया और जिनका "के"  सम्मान करते है | "के" के बोलने का तरीका सरल था परन्तु एक सूत्र में नहीं होता, और विषयांतर इतना सहज था कि  इसका आभास उन्हें भी नहीं होता  था वे अपने एक संस्मरण से कभी भी दूसरे पर चले जाते  थे ।
उस दिन भी यही हुआ, उन्होंने अपने कई संस्मरण सुनाये और अचानक कहने लगे "अच्छे काम करने के मौके बहुत कम मिलते हैं और बुरे कामों के लिए - एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं" |
उसके बाद भी वो कुछ समय के लिए बोले परन्तु मुझे उनकी इस बात ने उनके इस विचार ने बहुत प्रभावित किया, शायद अचेतन मन में यह बात रही हो परन्तु परोक्ष रूप से चैतन्य होकर पहली बार इस बात को सोचा और लगा क़ि अगर इस बात का मर्म हम समझ पायें तो जिन्दगी में कितनी ख़ुशी हम बाँट सकते है - ये बात कहने  की ज़रुरत नहीं क़ि ख़ुशी को बाँटने पर दुगुनी हो जाती है - देने वाला भी खुश और पाने वाला भी | उन्होंने जो कहा उसमे थोड़ा संशोधन किया जाये और उको अमल में लाया जाये - 

"अच्छे काम करने के मौके बहुत कम मिलते है" 


जब भी मौका मिले छोड़ना नहीं है |

  

Monday, February 21, 2011

फासले और मंज़िल

आज ही सुबह फेसबुक पर मेरे भांजे संदीप ने कुछ पंक्तियाँ पोस्ट की जो कुछ इस प्रकार हैं :- 

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....

अच्छी पंक्तियाँ हैं मगर कुछ अधूरी सी लगीं साथ ही नकारात्मक भी क्योंकि फासलों की बात करती हैं, इसलिए उसके आगे की  चंद पंक्तियाँ पूरी करने की कोशिश है जो मंजिल की बात करती हैं |

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....

था यकीं कि राहें चलती हैं चलने वालों से,
मिलेंगे राह में मुसाफिर कई,
कोई तो होगा जो हमसफ़र होगा, 

फासले कितने भी हों कम होंगे 
दूर कितनी भी हों मंज़िल, वहां हम होंगे |

Friday, February 18, 2011


सपनो को हकीकत में बदला है तुमने,
जिंदगी के मायने पूरे किये हैं तुमने |

था आधा, था अधूरा, कुछ कमी सी थी,
बदरा बन के तुम बरसी, हर तरफ तुम्हीं तुम हो |

वैलेंटाइन डे

वैलेंटाइन डे
अजीब सा डे है ये भी............
क्या प्रेम का इज़हार करने के लिए किसी ख़ास दिन या मौके की जरूरत होनी चाहिए ???
और अगर उस दिन चूक गए तो क्या प्रेम से भी चूक जायेंगे ???
नहीं ना ?
तो फिर इस दिन की अहमियत क्या है? क्यों इसे इतना अहम् बना दिया गया है ?
दिव्य भास्कर के १३ फ़रवरी के रविवारीय संस्करण में r` ma> qILyu gulab” (रेगिस्तान में खिला गुलाब) में डा. शरद ठाकर का लिखा   एक लेख पढ़ा जिसका शीर्षक था we>3 me> to mat/ taro p/em jo{Ae
( भेंट में तो मात्र तेरा प्रेम चाहिए) कहानी का सार ये था कि अमीर व्यक्ति जो कि बिल्डर है, वैलेंटाइन डे पर अपनी पत्नी लेके लिए एक महंगा गिफ्ट, साईट पर काम कर रहे एक मजदूर के हाथों भिजवाता है | मजदूर के पूछने पर बताता है कि आज वैलेंटाइन डे है और इस दिन प्रेमी अपनी प्रेमिका को,  पति अपनी पत्नी को गिफ्ट देते हैं और अपनी समझ के हिसाब से समझाता है कि गिफ्ट जितना महंगा उतना ही अधिक प्रेम | 
मजदूर, जिसका नाम रूमाल है, को अपनी पत्नी "रेशम" का ख्याल आता है वो भी अपने प्रेम को इज़हार करने को उतावला हो जाता है अपने इस इज़हार को मूर्त रूप देने के लिए एक गिफ्ट खरीदने के लिए एक मौल पहुँच जाता है | अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई के जमा किये २०० रुपयों से एक रेशमी दुपट्टा खरीद कर दौड़ता हुआ अपनी पत्नी के पास पहुँच जाता है और उसे देता है | पत्नी पूछती है की ये क्या ले आया ? वो कहता है ये "वैलेंटाइन गिफ्फ़" है | वो क्या होता है रेशम पूछती है ? तू अनपढ़ है, तुझे कुछ पता नहीं है आज बड़े लोगो का त्यौहार है और उसमें ऐसा "गिफ्फ़" देने का रिवाज़ है |
 रेशम दुपट्टे को देखकर कहती है कि  इस रेशमी दुपट्टे का मैं क्या करुँगी, मजदूरी करने से हुई अपनी मटमैली काया को दिखाते हुए कहती है कि टाट पर मखमल का पैबंद जैसा है ये रेशमी दुपट्टा | 
मजदूर, जिसका नाम " रूमाल" है,  को लगता है कि उसकी गाढ़ी कमाई के पैसे धूल में मिल गए और वो उदास सा एक तरफ जा कर बैठ जाता  है और रेशम शाम का भोजन खिचड़ी बनाने लग जाती है | 
अचानक रूमाल को रेशम की चीख सुनाई देती है " रूमाल, संभालना", रूमाल ऊपर देखता है तो पाता है कि चौथी मंजिल पर काम कर रहे एक मजदूर के हाथो से औज़ारो से भरी तगारी गिर रही है और उस  में रखे फावड़े कुदाल तेजी से उसी की ओर आ रहे हैं, रूमाल जान बचने के लिए दौड़ता है परन्तु फिर भी उस के पांव में फावड़े से गहरी चोट लग जाती है और उस में से खून की धारा बहने लगती है |
रेशम खून को देखकर घबरा जाती है और उसे रोकने के लिए तुरंत ही अपनी ओढनी को फाड़ कर जख्म पर बांधने को तत्पर होती है परन्तु उसे लगता है कि उसकी ओढनी तो बहुत गन्दी है, साफ़ कपड़े के लिए नज़र इधर उधर दौड़ाती है तो उसकी नज़र प्लास्टिक की थैली में बंधे रेशमी दुपट्टे पर पढ़ती है और वो तुरंत ही उस दुपट्टे को रूमाल के घाव पर बांध देती है |
रूमाल दोनों "रेशम" को देख रहा था, एक उसकी पत्नी  और दूसरा जो उसके पाँव में बंधा था, रूमाल ने रेशम से कहा पगली दो सौ रूपये के दुपट्टे को ऐसे कोई फाड़ता है क्या ?
रेशम की आँखों में आंसू थे- वो कहती है की ये दुपट्टा मेरे किस काम आता, तू मेरे लिए लाया था और मैंने तेरे लिए इसे काम में ले लिया, कहीं इसे ही तो वो तुम्हारा "वैलेंटाइन गिफ्फ़" नहीं कहते |
दोनों गरीब पति पत्नी खुले आसमान के नीचे मिलियन डॉलर जितने महंगे सानिध्य का आनंद ले रहे थे |

ठीक उसी समय उस बिल्डर की पत्नी उस से झगडा कर रही थी - बस आज के दिन भी मेरे लिए सिर्फ आठ हज़ार की ड्रेस लाये हो, अगर तुम मुझे सच्चा प्यार करते तो कम से कम हीरे का हार तो लाते, हे भगवान् , इस जंगली पुरुष ने तो मेरा वैलेंटाइन डे ही बर्बाद कर दिया |

लेखक ने अपनी कहानी यहीं ख़त्म कर दी परन्तु ये कहानी पढ़ कर मेरे मन में इसके आगे के प्रश्न उठने लगे - क्या दोनों किस्सों में प्रेम था? क्या दोनों पतियों को अपनी पत्नी से प्रेम नहीं था ? क्या दोनों का वैलेंटाइन डे पूरा हुआ ?
 मेरे विचार में दोनों को ही अपनी अपनी पत्नी से प्रेम था मगर दोनों का गिफ्ट देने का आशय अलग अलग था - बिल्डर अपनी पत्नी को खुश करने के लिए गिफ्ट लाया था, उसे लगता था पत्नी की खुशी से उसे भी खुशी मिलेगी परन्तु पत्नी की खुशी और उस के गिफ्ट दोनों के बीच फासला रह गया | न पत्नी खुश हुई न उसे ही खुशी मिली |
रूमाल अपनी पत्नी तक उस गिफ्ट के द्वारा अपने प्रेम को पहुँचाना चाहता था इसलिए उस गिफ्ट के द्वारा उसकी पत्नी तक उसका प्रेम पहुँच सका |

प्रेम - जिसमें बिना कहे भी सब कुछ कहा जाता है और बिना सुने भी सब कुछ समझा जाता है  | और इस कहने सुनने के लिए किसी "डे"  की ज़रुरत नहीं होती |

Wednesday, February 9, 2011

नए गाने

अक्सर हम शिकायत करते हैं कि आजकल के गाने पुराने गानों के मुकाबले कुछ भी नहीं हैं, जो बात पुराने गानों में होती थी वो अब नहीं होती, परन्तु ऐसा पूरी तरह सच नहीं है | आज भी अच्छे गाने आते हैं उसका एक उदाहरण है एक नयी फिल्म "टर्निंग ३०"  का गाना "सपने" जो न केवल सुनने में अच्छा है बल्कि गाने के बोल भी बढ़िया है..  

सपने, खिले हुए रंगों से, उड़े हुए पतंगों से
अम्बर से हैं ऊँचे
टुकड़े, बुझे हुए सूरज के, अभी अभी है चमके,
रोशन है उम्मीदें,
दी सुबह ने आहटें
सारे अरमान नींदों से जागे हैं
अब तो पीछे कुछ नहीं
जिन्हें मिलना है मंज़र वो आगे हैं
पा रा पा रा रा रा रा ..

खुद को ढूंढे यहाँ दूसरों में

वक्त बनके लहर बह गया
जाते जाते मगर कह गया
जिसे ढूँढ़ते हैं वो, ख़ुशी अपने ही अन्दर रहती है 
है खुद में जहाँ तेरा 
जिंदगी भी हमसे ये कहती है 
पा रा पा रा रा रा रा .. 


अब तो चेहरा नया मंजिलों का 
अब सफ़र है नया सिलसिलों का
हमसफ़र बनके ये होंसला
नयी दिशा में कहीं ले चला  
मिला है जो रास्ता 
इन कदमों में चलने कि ख्वाइश है
जिन्हें देखा दूर से 
 उन लम्हों को छूने की चाहत है
 पा रा पा रा रा रा रा ..


सपने, खिले हुए रंगों से, उड़े हुए पतंगों से
अम्बर से हैं ऊँचे
टुकड़े, बुझे हुए सूरज के, अभी अभी है चमके,
रोशन है उम्मीदें,
दी सुबह ने आहटें
सारे अरमान नींदों से जागे हैं
अब तो पीछे कुछ नहीं
जिन्हें मिलना है मंज़र वो आगे हैं
पा रा पा रा रा रा रा ..

Friday, February 4, 2011

लेह

लेह तुम मुझे बहुत याद आते हो,
सिन्धु के किनारे बैठ कर गुजारे हुए पल,
वो आसमान तक सर उठाये हुए पोपलर, 
वो बादल के कुछ टुकड़े, मानो खेल रहे हों लुका छिपी,
दूर तक फ़ैला आसमान,
नीलाभ का अर्थ होता है सार्थक जहाँ,

बदला क्यूँ रंग कुदरत ने,
थी मेहरबान फिर रूठी क्यों अचानक से,
पानी जो जीवन है बदल कर रूप बरसा था,
जो देता था जीवन लिए थे प्राण उसने ही,
एक ही पल में भूद्रशय था बदला,  
जहाँ सुन्दरता थी कभी फैली,
भयावह था अब वो मंज़र |

खुदाया तेरी रहमत हो, दुआ ये मांगते हैं हम,
बना दे स्वर्ग ये धरती, लौटा मुस्कान चेहरों पर |   



ऐ चाँद,  मेरा चाँद तो मेरे पास है,
जिसकी कभी अमावस नहीं होती |

ऐ सूरज, मेरा सूरज तो मेरे पास है,
जिसे देखकर मेरी सुबह होती है |

ऐ पवन,  मेरी पवन तो मेरे पास है,
जिसके झोंके मेरी सुबह और शाम को महकाते है |

ऐ जिंदगी न रश्क कर मेरी "जिंदगी" से,
 एक नज़र देख और इश्क कर मेरी "जिंदगी" से |

Wednesday, February 2, 2011

अतीत

कैसे भागू अतीत से वही तो मेरा आधार है,
आज को कल से जोड़ता वही तो सूत्रधार है |

"घड़ा" गया था कल जिसे वही तो प्यास बुझाता है,
तपा था कल जो आग में वही तो जगमगाता  है,
युग युगांतर से अविरत झेल रहा तूफ़ान हूं,
मैं हिमालय हूं, न साधारण कोई पहाड़ हूं |  

कैसे भागू अतीत से वही तो मेरा आधार है,
आज को कल से जोड़ता वही तो सूत्रधार है |

Monday, January 31, 2011

अफरातफरी

हर तरफ भागमभाग है, अफरातफरी है मारामारी है,
दूसरे को धकेल कर, आगे बढ़ने की होड़ पुरजोर जारी है |

बगल से कौन गुजरा, पीछे कौन छूटा ये देखना का वक्त नहीं है
तुम्हारी क्या बात करूँ, मेरे पास खुद मेरे लिए वक्त नहीं है |

हर तरफ भीड़ ही भीड़ है हर तरफ चेहरे ही चेहरे है
शोरगुल सुनाई नहीं देता, आवाज़ पर सन्नाटों के पहरे है |

रुक कर कोयल की कुहुकुहू सुन लें,  किसी मुस्कान का जवाब मुस्करा के दें,
दुश्वार नहीं है... आओ इन बातों के लिए जिंदगी से दो पल चुरा लें .....|

वक्त न रुका है न रुकेगा किसी के लिए, हर पल को, हर लम्हे को जी लें
मैं और तुम मुस्करा के मिलें, साथ में इन हसीं लम्हों को जी लें |

मैं भीड़ में एक चेहरा न रहूँ, तुम एक पहचान बन जाओ
जिन्दगी एक गीत है, मैं भी गाऊं तुम भी गुनगुनाओ |


Friday, January 28, 2011

फितरत


फितरत इन्सान की है खुदगर्जी की
हर समय चाहता है जिन्दगी अपनी मर्जी की
मैं, मेरा,  मेरा, करते करते जिंदगी पूरी गुजर जाती है 
कौन मिला, किसने दिया अपना हाथ और आगे बढ़ाया, 
पीछे कौन छूटा, किसके ऊपर चढ़ कर बढ़े है आगे,
जिंदगी की इस आपाधापी में किस के साथ कितनी दूर भागे,
आखरी सांस से पहले अगर हो इल्म इस बात का,
तो जिंदगी पूरी है वर्ना अधूरी ही गुजर जाती है .......

Thursday, January 27, 2011

ख़ुशी

ख़ुशी क्या है ?????

कुछ दिनों पहले मेरे डिपार्टमेंट की ऑफिसर्स मीट में  ये सवाल उठा था की ख़ुशी क्या है?? क्या इसे नापा जा सकता है ???  या फिर दो व्यक्तियों की ख़ुशी की तुलना की जा सकती है ???

ये सवाल इतने जटिल और भरी भरकम हैं की इनका जवाब थोडासा कठिन है और शायद हर व्यक्ति इसका जवाब अलग अलग और अलग अलग शब्दों में देगा |

पहले  सवाल के जवाब में अलग अलग प्रतिक्रिया मिलेगी किसी के पास एक बड़ा बंगला जिसके बाहर गुरखा हो जो की जब बड़ी सी गाडी में साहब आए तो सलाम ठोके,  अलग अलग बैंको के खाते हों और उन खातों में ढेर सारा पैसा हो, उस पैसे से वह टीवी, फ्रिज, ऐ सी इत्यादि खरीद सके यानि कि जीवन में हर तरह की सुविधा हो तो वह उन सुविधाओं को ख़ुशी कहेगा  |

उसके विपरीत यदि किसी को दोनों वक्त खाने को मिल जाये, चाहे खाने के लिए सूखी रोटियों पर चटनी ही क्यों न हो तो वह बहुत खुश होगा |

इस सन्दर्भ में एक कहानी याद आ रही हे जो पाउलो कोएलो के ब्लॉग पर पढ़ी थी -
एक व्यापारी ने अपने पुत्र को प्रसन्नता का रहस्य जानने के लिए एक बुद्धिमान वृद्ध के पास भेजा. चालीस दिन और चालीस रातों तक रेगिस्तान में चलता हुआ वह युवक अंततः एक पर्वत के शिखर पर बने हुए सुन्दर किले के पास पहुँच गया. वह बुद्दिमान वृद्ध वहीं रहता था.
उस किले में प्रवेश करने पर उसने देखा कि वहां मजमा-सा लगा हुआ था. चारों ओर राग-रंग बिखरा हुआ था. व्यापारियों की टोलियाँ घूम रहीं थीं. यहाँ-वहां बैठे लोग बतिया रहे थे. साजिंदों ने रागिनियाँ छेड़ रखीं थीं. दस्तरखानों पर दुनिया के बेहतरीन पकवान सजे हुए थे.
युवक ने भीड़ में बुद्धिमान वृद्ध को भी देखा. वह कई लोगों से बातें कर रहा था. सभी उससे कुछ पूछना कहते थे. अपनी बारी आने के लिए युवक को दो घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा.
वृद्ध ने बहुत धैर्यपूर्वक युवक से उसके वहां आने का कारण सुना. वृद्ध ने उससे कहा कि प्रसन्नता का रहस्य बताने के लिए उसके पास पर्याप्त समय नहीं है. उसने युवक से कहा कि वह एक-दो घंटे में किले के इर्द-गिर्द सैर करके वापस आ जाये.
“जाने से पहले मेरे लिए एक छोटा सा काम कर दो” - वृद्ध वे युवक से कहा. वृद्ध ने युवक को एक चम्मच में दो बूँद तेल डालकर दे दिया और कहा – “बाहर घूमते-फिरते समय इस चम्मच को अपने हाथ में रखे रहना और इसमें से तेल की बूँदें गिरने मत देना.”
युवक ने उस चम्मच को बहुत सावधानी से अपने हाथ में थामकर किले की बेशुमार सीढ़ियाँ चढीं-उतरीं और दसियों कमरों में से गुज़रा. उसकी नज़रें हमेशा चम्मच में मौजूद तेल पर ही टिकीं रहीं. दो घंटे के बाद वह वृद्ध के पास लौट आया.
“बढ़िया है” - वृद्ध ने युवक से कहा – “क्या तुमने हमारे भोजन कक्ष में टंगे बेशकीमती फ़ारसी परदे देखे? तुमने वह बाग़ तो देखे ही होंगे जिन्हें तराशने में हमारे सबसे हुनरमंद मालियों को भी दस साल लग गए! और तुमने किताबघर में रखीं नायाब किताबें देखीं?”
युवक ने झिझकते हुए कहा कि उसने वह सब नहीं देखा. उसके जहन में हर पल वृद्ध द्वारा सौंपी गईं तेल की बूंदों को गिरने से बचने की कवायद ही चल रही थी.
“कोई बात नहीं. तुम दोबारा जाओ और यह सब अच्छे से देखकर वापस आओ.” - वृद्ध ने युवक से कहा – “तुम उस आदमी पर तब तक यकीन नहीं कर सकते जब तक तुमने उसके घर को भली-भांति न देख लिया हो”.
इस बार युवक के मन में कोई परेशानी नहीं थी. उसी चम्मच को हाथ में थामे हुए युवक ने आराम से किले को देखा. इस बार उसने वृद्ध द्वारा बताई गईं खासियतों के साथ -साथ किले में मौजूद बेशुमार कलाकृतियों और बारीकियों का मुआयना किया. वापस लौटकर उसने वृद्ध को सब कुछ तफ़सील से बताया.
“ठीक है. लेकिन वह दो बूँद तेल कहाँ है जो मैंने तुम्हें हिफाज़त से रखने के लिए दिया था?” – वृद्ध ने पूछा.
उस चम्मच को देखने पर युवक को इस बात का इल्म हुआ कि चम्मच में से सारा तेल छलक चुका था.
“मायूस न हो मेरे बच्चे. मैं तुम्हें यही तो दिखाना चाहता था” – वृद्ध ने कहा – “प्रसन्नता का रहस्य इसी बात में है कि तुम इस दुनिया के सारे करिश्मे देख लो फिर भी तेल की उन दो बूंदों को चम्मच में से न छलकने दो.”

कहानी का सार यही है कि हम अपनी अपनी ख़ुशी को ढूंढे और उसे जी लें .

आज ही एक मेसेज पढ़ा -
"लोग खुश क्यों नहीं है ?????? 
क्योंकि वो ये ढूँढने में व्यस्त हैं कि दूसरे सब लोग  खुश क्यों हैं ?"

मुझे प्रेम है

मुझे प्रेम है तेरी आँखों से, जो चमक जाती हैं मुझे देख कर,
मुझे प्रेम है तेरे लबो से, जो मुस्करा देते हैं मेरी मुस्कराहट पर,
मुझे प्रेम है तेरी जुल्फों से, जो लहरा जाती हैं मेरे आगमन पर,
मुझे प्रेम है तेरे बदन की खुशबू से, जो महकती है मेरी नजदीकियों से,

तेरा प्रेम  रहेगा सदा  के  लिए ,
मेरी आँखों में तेरी  चमक बन कर,
मेरे लबों  पर  तेरी मुस्कराहट बन कर ,
मेरे बदन पर तेरी खुशबू  बन कर,
मेरी  यादों में    मेरे  आखरी  ख्याल तक .....

 



 

  

Thursday, January 13, 2011

Try & Try till you succeed

  अक्सर हम बड़े उत्साह और उल्लास से कोई भी काम शुरू तो कर देते हैं परन्तु थोड़ी सी भी कठिनाई आने पर हिम्मत हारने लगते है और निराशा के सागर में डूब  जाते हैं | तब ओरिजिनल बिग बी यानि की हरिवंश राय बच्चन साहब की यह कविता को पढ़ कर अनुसरण करें तो आगे बदने की प्रेरणा मिलती है और कठिन से कठिन  कार्य भी पूरे हो जाते हैं |

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।


मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।


डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।


असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।