Monday, February 21, 2011

फासले और मंज़िल

आज ही सुबह फेसबुक पर मेरे भांजे संदीप ने कुछ पंक्तियाँ पोस्ट की जो कुछ इस प्रकार हैं :- 

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....

अच्छी पंक्तियाँ हैं मगर कुछ अधूरी सी लगीं साथ ही नकारात्मक भी क्योंकि फासलों की बात करती हैं, इसलिए उसके आगे की  चंद पंक्तियाँ पूरी करने की कोशिश है जो मंजिल की बात करती हैं |

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....

था यकीं कि राहें चलती हैं चलने वालों से,
मिलेंगे राह में मुसाफिर कई,
कोई तो होगा जो हमसफ़र होगा, 

फासले कितने भी हों कम होंगे 
दूर कितनी भी हों मंज़िल, वहां हम होंगे |

Friday, February 18, 2011


सपनो को हकीकत में बदला है तुमने,
जिंदगी के मायने पूरे किये हैं तुमने |

था आधा, था अधूरा, कुछ कमी सी थी,
बदरा बन के तुम बरसी, हर तरफ तुम्हीं तुम हो |

वैलेंटाइन डे

वैलेंटाइन डे
अजीब सा डे है ये भी............
क्या प्रेम का इज़हार करने के लिए किसी ख़ास दिन या मौके की जरूरत होनी चाहिए ???
और अगर उस दिन चूक गए तो क्या प्रेम से भी चूक जायेंगे ???
नहीं ना ?
तो फिर इस दिन की अहमियत क्या है? क्यों इसे इतना अहम् बना दिया गया है ?
दिव्य भास्कर के १३ फ़रवरी के रविवारीय संस्करण में r` ma> qILyu gulab” (रेगिस्तान में खिला गुलाब) में डा. शरद ठाकर का लिखा   एक लेख पढ़ा जिसका शीर्षक था we>3 me> to mat/ taro p/em jo{Ae
( भेंट में तो मात्र तेरा प्रेम चाहिए) कहानी का सार ये था कि अमीर व्यक्ति जो कि बिल्डर है, वैलेंटाइन डे पर अपनी पत्नी लेके लिए एक महंगा गिफ्ट, साईट पर काम कर रहे एक मजदूर के हाथों भिजवाता है | मजदूर के पूछने पर बताता है कि आज वैलेंटाइन डे है और इस दिन प्रेमी अपनी प्रेमिका को,  पति अपनी पत्नी को गिफ्ट देते हैं और अपनी समझ के हिसाब से समझाता है कि गिफ्ट जितना महंगा उतना ही अधिक प्रेम | 
मजदूर, जिसका नाम रूमाल है, को अपनी पत्नी "रेशम" का ख्याल आता है वो भी अपने प्रेम को इज़हार करने को उतावला हो जाता है अपने इस इज़हार को मूर्त रूप देने के लिए एक गिफ्ट खरीदने के लिए एक मौल पहुँच जाता है | अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई के जमा किये २०० रुपयों से एक रेशमी दुपट्टा खरीद कर दौड़ता हुआ अपनी पत्नी के पास पहुँच जाता है और उसे देता है | पत्नी पूछती है की ये क्या ले आया ? वो कहता है ये "वैलेंटाइन गिफ्फ़" है | वो क्या होता है रेशम पूछती है ? तू अनपढ़ है, तुझे कुछ पता नहीं है आज बड़े लोगो का त्यौहार है और उसमें ऐसा "गिफ्फ़" देने का रिवाज़ है |
 रेशम दुपट्टे को देखकर कहती है कि  इस रेशमी दुपट्टे का मैं क्या करुँगी, मजदूरी करने से हुई अपनी मटमैली काया को दिखाते हुए कहती है कि टाट पर मखमल का पैबंद जैसा है ये रेशमी दुपट्टा | 
मजदूर, जिसका नाम " रूमाल" है,  को लगता है कि उसकी गाढ़ी कमाई के पैसे धूल में मिल गए और वो उदास सा एक तरफ जा कर बैठ जाता  है और रेशम शाम का भोजन खिचड़ी बनाने लग जाती है | 
अचानक रूमाल को रेशम की चीख सुनाई देती है " रूमाल, संभालना", रूमाल ऊपर देखता है तो पाता है कि चौथी मंजिल पर काम कर रहे एक मजदूर के हाथो से औज़ारो से भरी तगारी गिर रही है और उस  में रखे फावड़े कुदाल तेजी से उसी की ओर आ रहे हैं, रूमाल जान बचने के लिए दौड़ता है परन्तु फिर भी उस के पांव में फावड़े से गहरी चोट लग जाती है और उस में से खून की धारा बहने लगती है |
रेशम खून को देखकर घबरा जाती है और उसे रोकने के लिए तुरंत ही अपनी ओढनी को फाड़ कर जख्म पर बांधने को तत्पर होती है परन्तु उसे लगता है कि उसकी ओढनी तो बहुत गन्दी है, साफ़ कपड़े के लिए नज़र इधर उधर दौड़ाती है तो उसकी नज़र प्लास्टिक की थैली में बंधे रेशमी दुपट्टे पर पढ़ती है और वो तुरंत ही उस दुपट्टे को रूमाल के घाव पर बांध देती है |
रूमाल दोनों "रेशम" को देख रहा था, एक उसकी पत्नी  और दूसरा जो उसके पाँव में बंधा था, रूमाल ने रेशम से कहा पगली दो सौ रूपये के दुपट्टे को ऐसे कोई फाड़ता है क्या ?
रेशम की आँखों में आंसू थे- वो कहती है की ये दुपट्टा मेरे किस काम आता, तू मेरे लिए लाया था और मैंने तेरे लिए इसे काम में ले लिया, कहीं इसे ही तो वो तुम्हारा "वैलेंटाइन गिफ्फ़" नहीं कहते |
दोनों गरीब पति पत्नी खुले आसमान के नीचे मिलियन डॉलर जितने महंगे सानिध्य का आनंद ले रहे थे |

ठीक उसी समय उस बिल्डर की पत्नी उस से झगडा कर रही थी - बस आज के दिन भी मेरे लिए सिर्फ आठ हज़ार की ड्रेस लाये हो, अगर तुम मुझे सच्चा प्यार करते तो कम से कम हीरे का हार तो लाते, हे भगवान् , इस जंगली पुरुष ने तो मेरा वैलेंटाइन डे ही बर्बाद कर दिया |

लेखक ने अपनी कहानी यहीं ख़त्म कर दी परन्तु ये कहानी पढ़ कर मेरे मन में इसके आगे के प्रश्न उठने लगे - क्या दोनों किस्सों में प्रेम था? क्या दोनों पतियों को अपनी पत्नी से प्रेम नहीं था ? क्या दोनों का वैलेंटाइन डे पूरा हुआ ?
 मेरे विचार में दोनों को ही अपनी अपनी पत्नी से प्रेम था मगर दोनों का गिफ्ट देने का आशय अलग अलग था - बिल्डर अपनी पत्नी को खुश करने के लिए गिफ्ट लाया था, उसे लगता था पत्नी की खुशी से उसे भी खुशी मिलेगी परन्तु पत्नी की खुशी और उस के गिफ्ट दोनों के बीच फासला रह गया | न पत्नी खुश हुई न उसे ही खुशी मिली |
रूमाल अपनी पत्नी तक उस गिफ्ट के द्वारा अपने प्रेम को पहुँचाना चाहता था इसलिए उस गिफ्ट के द्वारा उसकी पत्नी तक उसका प्रेम पहुँच सका |

प्रेम - जिसमें बिना कहे भी सब कुछ कहा जाता है और बिना सुने भी सब कुछ समझा जाता है  | और इस कहने सुनने के लिए किसी "डे"  की ज़रुरत नहीं होती |

Wednesday, February 9, 2011

नए गाने

अक्सर हम शिकायत करते हैं कि आजकल के गाने पुराने गानों के मुकाबले कुछ भी नहीं हैं, जो बात पुराने गानों में होती थी वो अब नहीं होती, परन्तु ऐसा पूरी तरह सच नहीं है | आज भी अच्छे गाने आते हैं उसका एक उदाहरण है एक नयी फिल्म "टर्निंग ३०"  का गाना "सपने" जो न केवल सुनने में अच्छा है बल्कि गाने के बोल भी बढ़िया है..  

सपने, खिले हुए रंगों से, उड़े हुए पतंगों से
अम्बर से हैं ऊँचे
टुकड़े, बुझे हुए सूरज के, अभी अभी है चमके,
रोशन है उम्मीदें,
दी सुबह ने आहटें
सारे अरमान नींदों से जागे हैं
अब तो पीछे कुछ नहीं
जिन्हें मिलना है मंज़र वो आगे हैं
पा रा पा रा रा रा रा ..

खुद को ढूंढे यहाँ दूसरों में

वक्त बनके लहर बह गया
जाते जाते मगर कह गया
जिसे ढूँढ़ते हैं वो, ख़ुशी अपने ही अन्दर रहती है 
है खुद में जहाँ तेरा 
जिंदगी भी हमसे ये कहती है 
पा रा पा रा रा रा रा .. 


अब तो चेहरा नया मंजिलों का 
अब सफ़र है नया सिलसिलों का
हमसफ़र बनके ये होंसला
नयी दिशा में कहीं ले चला  
मिला है जो रास्ता 
इन कदमों में चलने कि ख्वाइश है
जिन्हें देखा दूर से 
 उन लम्हों को छूने की चाहत है
 पा रा पा रा रा रा रा ..


सपने, खिले हुए रंगों से, उड़े हुए पतंगों से
अम्बर से हैं ऊँचे
टुकड़े, बुझे हुए सूरज के, अभी अभी है चमके,
रोशन है उम्मीदें,
दी सुबह ने आहटें
सारे अरमान नींदों से जागे हैं
अब तो पीछे कुछ नहीं
जिन्हें मिलना है मंज़र वो आगे हैं
पा रा पा रा रा रा रा ..

Friday, February 4, 2011

लेह

लेह तुम मुझे बहुत याद आते हो,
सिन्धु के किनारे बैठ कर गुजारे हुए पल,
वो आसमान तक सर उठाये हुए पोपलर, 
वो बादल के कुछ टुकड़े, मानो खेल रहे हों लुका छिपी,
दूर तक फ़ैला आसमान,
नीलाभ का अर्थ होता है सार्थक जहाँ,

बदला क्यूँ रंग कुदरत ने,
थी मेहरबान फिर रूठी क्यों अचानक से,
पानी जो जीवन है बदल कर रूप बरसा था,
जो देता था जीवन लिए थे प्राण उसने ही,
एक ही पल में भूद्रशय था बदला,  
जहाँ सुन्दरता थी कभी फैली,
भयावह था अब वो मंज़र |

खुदाया तेरी रहमत हो, दुआ ये मांगते हैं हम,
बना दे स्वर्ग ये धरती, लौटा मुस्कान चेहरों पर |   



ऐ चाँद,  मेरा चाँद तो मेरे पास है,
जिसकी कभी अमावस नहीं होती |

ऐ सूरज, मेरा सूरज तो मेरे पास है,
जिसे देखकर मेरी सुबह होती है |

ऐ पवन,  मेरी पवन तो मेरे पास है,
जिसके झोंके मेरी सुबह और शाम को महकाते है |

ऐ जिंदगी न रश्क कर मेरी "जिंदगी" से,
 एक नज़र देख और इश्क कर मेरी "जिंदगी" से |

Wednesday, February 2, 2011

अतीत

कैसे भागू अतीत से वही तो मेरा आधार है,
आज को कल से जोड़ता वही तो सूत्रधार है |

"घड़ा" गया था कल जिसे वही तो प्यास बुझाता है,
तपा था कल जो आग में वही तो जगमगाता  है,
युग युगांतर से अविरत झेल रहा तूफ़ान हूं,
मैं हिमालय हूं, न साधारण कोई पहाड़ हूं |  

कैसे भागू अतीत से वही तो मेरा आधार है,
आज को कल से जोड़ता वही तो सूत्रधार है |