Monday, February 21, 2011

फासले और मंज़िल

आज ही सुबह फेसबुक पर मेरे भांजे संदीप ने कुछ पंक्तियाँ पोस्ट की जो कुछ इस प्रकार हैं :- 

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....

अच्छी पंक्तियाँ हैं मगर कुछ अधूरी सी लगीं साथ ही नकारात्मक भी क्योंकि फासलों की बात करती हैं, इसलिए उसके आगे की  चंद पंक्तियाँ पूरी करने की कोशिश है जो मंजिल की बात करती हैं |

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी
और पीछे हम रह गए थे.....

था यकीं कि राहें चलती हैं चलने वालों से,
मिलेंगे राह में मुसाफिर कई,
कोई तो होगा जो हमसफ़र होगा, 

फासले कितने भी हों कम होंगे 
दूर कितनी भी हों मंज़िल, वहां हम होंगे |

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