बात उन दिनों की है जब मैं अहमदाबाद-३ के लेखा परीक्षा विभाग में कार्यरत था और ऋषि सर हमारे आयुक्त थे । ऋषि सर के कार्यकाल के दौरान किसी भी अधिकारी को उस अनजाने डर का डर नहीं होता था जो अन्य उच्च अधिकारियों के सामने जाने के दौरान होता था ।
ऋषि सर अपने विस्तृत अनुभवों के द्वारा हमारे दिमाग की अधखुली खिडकियों को खोल रहे थे । इसी कड़ी में एक कार्यक्रम था "ऑफिसर्स मीट" जिसमे कुछ अधिकारियों को आमंत्रित किया जाता था जो अपने अनुभवों को उपस्थित साथी अधिकारियों के साथ शेयर करते थे । इस सभा में वक्ता अपने कार्य से सम्बंधित या फिर अपने दैनिक जीवन में घटी किसी घटना के बारे में बता सकते थे, अर्थात विषय पर कोई पाबन्दी नहीं थी और इसी कारण ये सभा अनौपचारिक माहौल में होती थी तथा मेरे जैसे उन लोगो ले लिए एक सुन्दर माध्यम बन गयी थी जो मंच पर वक्तव्य देने में असुविधा महसूस करते थे । ऐसी ही एक सभा का अनुभव यहाँ शेयर करना चाहता हूं ….
उस दिन की सभा में भी कई अधिकारी आमंत्रित थे जिन्होंने अपने अपने चुने हुए विषय पर कुछ न कुछ बोला| कुछ ने अपने कार्य से सम्बंधित तो कुछ ने अपने निजी संस्मरण सुनाये | सभी ने अपने विचार अपने नजरिये को अपनी समझ के हिसाब से कहा जिसे सभी उपस्थित लोगों ने सुना और प्रत्येक ने अपने विचार, अपने नजरिये से उन बातों को समझा | जिस वक्तव्य से मैं प्रभावित हुआ अब उस वक्तव्य की बात करते हैं ।
मेरे एक सहकर्मी ने, जिनका नाम नहीं बताना चाहूँगा, सिर्फ "के" कहूँगा, अपने जीवन के संस्मरण सुनाये |
आगे बढ़ने से पहले "के" के बारे में बता दूँ - "के" अपने विभाग को अच्छा खासा समय देने के बाद रिटायरमेंट के कगार पर थे, वो सौराष्ट्र के रहने वाले एक सीधे साधे इंसान हैं जो अपने ठेठ देहाती लहजे में हिंदी को गुजराती संसकरण में बोलते हैं | दिल खोलके और सीधे दिल से, बिना किसी लाग लपेट के बोलते हैं उनके बोलने का अंदाज काफी मजाकिया लगता है परन्तु उनकी बातों में जीवन की सच्चाई होती है |
"के" ने कई बातें बोली जो उनके उन उच्च अधिकारीयों के बारे में थी जिन्होंने "के" के मन को प्रभावित किया और जिनका "के" सम्मान करते है | "के" के बोलने का तरीका सरल था परन्तु एक सूत्र में नहीं होता, और विषयांतर इतना सहज था कि इसका आभास उन्हें भी नहीं होता था वे अपने एक संस्मरण से कभी भी दूसरे पर चले जाते थे ।
उस दिन भी यही हुआ, उन्होंने अपने कई संस्मरण सुनाये और अचानक कहने लगे "अच्छे काम करने के मौके बहुत कम मिलते हैं और बुरे कामों के लिए - एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं" |
उसके बाद भी वो कुछ समय के लिए बोले परन्तु मुझे उनकी इस बात ने उनके इस विचार ने बहुत प्रभावित किया, शायद अचेतन मन में यह बात रही हो परन्तु परोक्ष रूप से चैतन्य होकर पहली बार इस बात को सोचा और लगा क़ि अगर इस बात का मर्म हम समझ पायें तो जिन्दगी में कितनी ख़ुशी हम बाँट सकते है - ये बात कहने की ज़रुरत नहीं क़ि ख़ुशी को बाँटने पर दुगुनी हो जाती है - देने वाला भी खुश और पाने वाला भी | उन्होंने जो कहा उसमे थोड़ा संशोधन किया जाये और उको अमल में लाया जाये -
"अच्छे काम करने के मौके बहुत कम मिलते है"
जब भी मौका मिले छोड़ना नहीं है |