रूठी हो तो भी चुप ना रहो
मन में
जो है मुझ से कहो
अच्छा
या बुरा सब बोल दो
मन की
गिरह को खोल दो
तुम ना
बोलोगी तो भी
मैं सुन
लूंगा तेरे मन की बात
दूर रहा
मैं तुझ से हुई ना मन की बात
कहना
मैं भी चाहूँ ढेरों मेरे मन की
तू तो
जाने सजनी सब बातें
तेरे
मेरे मन की
छोडो ये
गुस्सा मान भी जाओ
दे दो मुझको
माफ़ी और प्यार से मुस्कुराओ
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